BOROLINE इस स्वदेशी कंपनी पर एक रुपये का भी कर्ज नहीं- देश कि आजादी पर मुफ्त बांटी थी एक लाख क्रीम

BOROLINE की उम्र भले ही 87 साल हो गई ह मगर इसकी माली सेहत समय के साथ और मजबूत होती जा रही। बोरोलिने खुशबूदार एंटीसेप्टिक जिंगल और हरे रंग की ट्यूब वाली क्रीम है

जब देश आजाद हुआ था तो बांटी थी एक लाख बोरोलीन क्रीम

ब्रिटिश शासकों और कंपनियों के खिलाफ जनता में जबर्दस्त आक्रोश। जगह-जगह विदेशी कपड़ों की होली जलाई जा रही थी। 1857 के बाद से फिर राष्ट्रवादी माहौल का उभार शुरू हुआ। उसी कालचक्र में 1925 में विदेशी कंपनियों का मुकाबला करने के लिए भी कोई स्वदेशी कंपनी होनी चाहिए थी।

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फोटो-अपनी फैक्ट्री में मौजूद बोरोलीन कंपनी के एमडी देबाशीष दत्त

फिर इन विदेशी कंपनियों को पछाड़ ने के लिये स्वदेशी कंपनी 1929 में गौर मोहन दत्ता ने स्वदेशी आंदोलन को व्यावसायिक धरातल पर उतारते हुए जीडी फार्मास्युटिकल्स की कलकत्ता में नींव डाली। जब कंपनी ने BOROLINE क्रीम बाजार में उतारी तो अंग्रेजी हुकुमत में बोरोलीन जैसी भारतीय कंपनी की लोकप्रियता से अंग्रेज अफसर परेशान हो गए।

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उन्होंने कई तरह की बंदिशें डालनी शुरू कीं, मगर इन सबसे लड़ते हुए BOROLINE क्रीम हिंदुस्तान की जनता के हाथ पहुंचती रही। तब से आज 87 साल हो गए, मगर आज भी कंपनी की सेहत पर कोई असर नहीं है।

जहां आज बडे़-बड़े औद्यौगिक घरानों की कंपनियों हजारों करोड़ के कर्ज में डूबी हैं वहीं यह स्वदेशी मॉडल की कंपनी पर देश की जनता का सरकार का एक रुपया भी कर्ज नहीं है। बिना किसी मार्केटिंग तामझाम के भी यह कंपनी 2015-16 में 105 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करने में सफल रही। BOROLINE प्रोडक्ट की लोकप्रियता का ही नतीजा है

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