दुनियां में इस्लाम ही अकेला ऐसा धर्म है जो इस दुनिया की सही तौर पर रहनुमाई कर सकता है – प्रोफेसर बैनिल हैविट

अमेरिका की प्रोफेसर बैनिल हैविट अमेरिका के एक मशहूर विचारक और लेखक रहे हैं। उनकी गिनती अमेरिका के इस्लाम कबूल करने वाले अहम लोगों में की जाती है। उनका इस्लामी नाम अब्दुल्लाह हसन बैनिल है। इस लेख में उन्होंने इस्लाम की उन खूबियों का जिक्र किया है जिनसे वे बेहद प्रभावित हुए थे।

मेरा इस्लाम कबूल करना कोई ताज्जुब की बात नहीं है न ही इसमें किसी तरह के लालच का कोई दखल है। मेरे खयाल में यह जहन की फितरती तब्दीली और उन धर्मों का ज्यादा अध्ययन करने का नतीजा है जो इंसानी अक्लों पर काबिज है। मगर यह बदलाव उसी शख्स में पैदा हो सकता है जिसका दिल व दिमाग धार्मिक पक्षपात और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठा हुआ हो और साफ दिल से अच्छे और बुरे में अंतर कर सकता हो।

मैं मानता हूं कि ईसाइयत में भी कुछ सच्चे और मुफीद उसूल मौजूद हैं लेकिन इस धर्म में पादरियों ने कई गलत चीजों को मिला दिया। उन्होंने इस तरह इस धर्म की सूरत को बिगाड़ कर रख दिया और इसे बिलकुल बेजान कर डाला। इसके विपरीत इस्लाम उसी मूल शक्ल में मौजूद है जिसमें वह प्रकट हुआ। चूंकि मैं एक ऐसे धर्म की तलाश में था जो मिलावट से पवित्र हो इसलिए मैंने इस्लाम कबूल कर लिया।

इसके अलावा पादरियों के चमकते दमकते वस्त्रों पर नजर डालिए, फिर ननों की भीड़ को देखिए तो उनका रूहानियत से दूर का संबंध भी दिखाई नहीं देता। ऐसा मालूम होता है कि हम किसी इबादत खाने में नहीं बल्कि एक ऐसे बुतखाने में खड़े हैं जो सिर्फ बुतों की पूजा के लिए बनाया गया है।

मस्जिद वहां आपको न कोई मूरत दिखाई देगी और न कोई तस्वीर। फिर नमाजियों की लाइनों पर नजर डालिए। हजारों छोटे बड़े इंसान कंधे से कंधा मिलाए खड़े नजर आएंगे। सच तो यह है कि नमाज में रूकू और सजदों का मंजर इस कदर दिल और नजर को खींचने वाला होता है कि कोई इंसान इससे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता।

मस्जिद का पूरा माहौल और उसकी तमाम चीजें रूहानियत (अध्यात्म) की तरफ इंसान की रहनुमाई करती है। न वहां बनावट है और न बुनियादी सजावट।। इसके विपरीत चर्च की तमाम चीजों में भौतिक चमक-दमक का दिखावा बहुत ज्यादा है। हो सकता है कि कुछ लोग ऐतराज करें कि प्रोटेसटेंट धर्म तो इन बुराइयों से पवित्र है और उसने तो अपने गिरजों से बुत और तस्वीरें निकाल फैंकी है, तुमने इस्लाम के बजाय इसे कबूल क्यों नहीं किया।

मेरा एक लंबे समय से इस्लाम की तरफ झुकाव था, लेकिन मेरा ईमान इतना मजबूत नहीं हुआ था कि बेधड़क अपने मुसलमान होने का ऐलान कर सकु। यह संकोच किसी समाज या इंसान के डर के कारण नहीं था बल्कि उसकी वजह यह थी कि मैं पूरी तरह इस्लाम की खूबियों से परिचित नहीं था। लेकिन इस्लाम के बारे में जैसे-जैसे इस्लामिक विद्वानों की किताबें पढ़ता गया, मेरी आंखें खुलती गईं। मुझे साफ तौर पर इस धर्म की खूबियां और इसके आखरी पैगंबर मुहम्मद सल्ल. का इंसानों पर एहसान मालूम हो गया और आखिर में मैंने इस मजहब को अपना लिया।
इस्लाम धार्मिक मामलों में ही इंसान का मार्गदर्शन नहीं करता बल्कि दुनिया के हर मामले में इंसान को बेहतर रास्ता दिखाता है और उसके हर कदम पर रहनुमाई करता है। इस्लाम ने दुनिया को आखिरत (परलोक) की खेती करार दिया है और इंसान को हुक्म दिया है कि वह धार्मिक कर्तव्यों को निभाने के साथ-साथ दुनिया से जुड़े अपने कर्तव्यों को निभाने में भी कोताही न बरते। सच तो यह है कि मौजूदा वैज्ञानिक दौर में इस्लाम ही अकेला ऐसा धर्म है जो तरक्की पसंद इस दुनिया की सही तौर पर रहनुमाई कर सकता है, इसे सही राह दिखा सकता है।

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