कर्बला की ज़मीन मुहर्रम के दिन क्यों लाल हो जाती है- आइये जानते है मुहर्रम से जुडी कुछ बाते

मुहर्रम इतिहास के पन्नों पर दर्ज वो कहानी है जिसे कोई भुला ही नहीं सकता मुहर्रम को चन्द लफ़्ज़ों में समेट पाना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि यह त्यौहार इस्लाम के इतिहास में सबसे बड़ा त्यौहार है कहते हैं की इस दिन कर्बला की मिट्टी भी लाल हो जाती है। और यह महीना इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से नए साल की शुरुआत करता है। आइये जानते है मुहर्रम से जुड़ी कुछ अहम् बातें जो हर इंसान को जानना ज़रूरी है।

इस्लाम के इतिहास में मुहर्रम सबसे बड़ा त्यौहार है

मुहर्रम का त्यौहार क्यों मनाया जाता है
हज़रत मोहम्मद (सल्ल,) जिन्होंने इस्लाम की बुनियाद रखी व् पूरी दुनिया में इस्लाम फैलाया हज़रत मोहम्मद (सल्ल,) आपकी एक बेटी थी हज़रत फातिमा और आपके दो नवासे हुआ करते थे, हज़रत हसन और हज़रत हुसैन। मुहर्रम की 10 तारीख को, हक़ और बातिल की लड़ाई में लड़ते हुए हज़रत हुसैन की शहादत हुई थी। इसी शहादत को मुहर्रम नाम दिया गया है

10 तारीख़ को क्या हुआ था

मुहर्रम की 10 तारीख को “अशुरा” भी कहा जाता है। यह बात वाक़ई सबक हासिल करने लायक़ है कि हज़रत इमाम हुसैन की फ़ौज में सिर्फ 72 लोग थे, जिनमे औरतें, बच्चे और बुज़ुर्ग भी शामिल थे और यहूदी की फ़ौज में लाखों की तादाद में सिपाही शामिल थे। लेकिन सिर्फ 72 लोगों ने इस जंग में जीत हासिल की। यहूदी इंसानियत और इस्लाम दोनों का ही दुश्मन था।

ख़ाक-ए-करबला

यह कर्बला की सर ज़मी हैं जो की इराक में है। कहा जाता है कि मुहर्रम की 10 तारीख़ को यहाँ की मिट्टी लाल हो जाती है। इस जगह पर धोख़े से हज़रत हुसैन का सर कलम किया गया था।

क्यों पिलाया जाता है शबील

हज़रत हुसैन और यहूदी की जंग छिड़ी यहूदियो ने अपनी ताक़त और फ़ौज का इस्तेमाल करते हुए हज़रत हुसैन और उनके साथियों को पानी व खाने से महरूम कर दिया। पानी पर इस तरह पहरा लगा दिया गया था कि हज़रत हुसैन के साथी प्यास की वजह से दम तोड़ने लगे थे। प्यासा मार देने की वजह से कर्बला की जंग को हमेशा याद किया जाता है।
ताज़िये भी बनाये जाते हैं.

मुस्लिम समाज के लोग ताज़िये बनाते हैं। हालाँकि कई लोग ताज़िये बनाने को सही नहीं मानते लेकिन इसमें कुछ भी बोल पाना सही नहीं होगा, क्योंकि सबका अपना-अपना अक़ीदा होता है।

होता है मातम

मुहर्रम की 10 तारीख को मातम मनाया जाता है। हज़रत हुसैन की कुर्बानी का मातम, जब यहूदी ने हज़रत का सर कलम किया उस वक़्त हज़रत नमाज़ अदा कर रहे थे। जैसे ही हज़रत सजदे में झुके तो धोखे से उनका सर कलम कर दिया गया।

हज़रत का फरमान

ज़िन्दगी में दो तरह के दिन आते हैं, एक जिसमे आप जीतते हैं, और दूसरा वो दिन जो आपके खिलाफ होता है। जब तुम्हारी जीत हो तो घमंड मत करो और जब चीज़ें तुम्हारे खिलाफऔर हार हो जाएँ तो सब्र करो। दोनों ही दिन तुम्हारे लिए परीक्षा हैं।

क्या सिखाता है मुहर्रम

जैसे की मैंने बताया की हज़रत की फ़ौज में सिर्फ 72 लोग थे और दूसरी और यहूदी की फ़ौज में लाखों की तादाद में लोग शामिल थे। फिर भी जीत हज़रत की हुई, बेइंतेहा ज़ुल्म सहकर, प्यासे रहकर और अपनी जान गवांकर उन्होंने सच्चाई की यह जंग जीती।सबक यह है कि सच्चाई को कोई ताक़त पराजित नहीं कर सकती। अंत में हज़रत के यह अल्फ़ाज़ जिन्हें हमेशा याद रखने चाहिए। “कभी भी किसी के दुःख को देखकर खुश मत हो क्योंकि तुम्हे पता नहीं है भविष्य में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है।”

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